“बाते है कई कहने”

बाते है कई कहने को उनसे
पर अल्फ़ाज़ नहीं है हमारे पास
यादे कई है उनकी हमारे दिल में
पर उनका साथ नहीं है हमारे पास

ज़िन्दगी की डोर ने कुछ यु उलझन बनाई
हम सवारने की कोशिस में रह गए
और वो डोर को ही छोर चल परे अकेले राह पे
शिक़ायत किसी भी नहीं मै
कोई है भी नहीं जो हमे समझता अभी

ढूँढ़ते है इस भीड़ में हम खुद को
पर ग़ुम से हो जाते है उस उलझी हुई डोर में कही
फासले दर्मिया इतने भी नहीं है अभी
एक कदम वो बढ़ा के तो देखें
चार कदम हम खुद चल पड़ेंगे साथ देने को अभी

दूरियाँ इतना भी बढ़ा ना , साथ रहता न कोई
ज़िन्दगी की इस राह में नक़ाब पहने चलता हर कोई
बढ़ा कर देख ले चार कदम तू
अनजाने मिलेंगे कई
हम न हँगे उस भीड़ में कही
क्युकी हम न रख पाते नक़ाब कोई

बातें कई है कहने को
पर अल्फाज़ नहीं है बस
अल्फाज़ नहीं है। ………

————by S.K.R

 

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