एक रिश्ता ऐसा भी हुआ
ना उसने कुछ कहा, ना इसने कुछ सुना
फिर भी बाते करते रहे दोनो कुछ पल साथ मे
एक रिश्ता ऐसा भी हुआ
ना वजह थी कोई मुस्कुराने की, ना कारन था उदास रहने का
फिर भी जब एक दूजे के दर्मियां होते,
मुस्कान चेहरे पे बेवजह बिखेरते दोनो
और ना होते तो एक दूजे की कमी को वो महसूस करते
एक रिश्ता ऐसा भी हुआ
बिन कहे समझने लगे दोनो एक दूजे की बातो को
अब खामोशी भी बयाँ करने लगी उनके जज़्बातो को
कहने को अलग थे वो दोनो एक दूजे से,
पर दो जिस्म एक जान बन चुके थे वो
एक रिश्ता ऐसा भी हुआ
ना रह पाये दोनो इक पल को दूर एक दूजे से
मेहसूस करने लगे एक दूजे की मौजूदगी को
क्या हो रहा था, वो खुद भी ना जान सेक
खोने लगे एक दूजे की मुस्कुराहट मे कही
मिलने लगी उन्हे इक नयी जिन्दगी इस जीवन की राह मे
एक दूजे को कहते वो दोस्त ह हम,
पर दोस्ती से कई परे थे दोनो एक दूजे के लिये
लोगो ने उनके रिश्ते को प्यार का नाम दिया,
परंतु प्यार शब्द भी कही कम पर गया बाय करने को
ना जाने वो कौन सा रिश्ता था उनके दर्मियां
जिसका वो नाम ना दे पाये खुल के कभी
जब तक रहे साथ एक दूजे के,
जिंदगी जी ली एक नये जमाने मे ही कही
वो बेनाम रिश्ता आज भी है कही उसके दर्मियां
धुंध्ता है वो उस लड़की को अपने दर्मियां
कहने को कोई रिश्ता ना जुरा था
लेकिन, एक रिश्ता ऐसा भी हुआ था ।……….
As I have always said that your poems are fantastic and so it is👍👌
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Thank You 😊
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