क्या समझ पाओगे तुम

फोन पे तेरा नाम देख के धारकनो का तेज हो जाना,
तेरे एक मैसेज के जवाब मे पुरे दिन इन्तज़ार करना
की तेरे लिखे हुए खत पढते हुए तुझे मेहसूस कर पाना
क्या समझ पाओगे तुम जज़्बात मेरे

तेरे पास ना होने पे इस मन यूही मचलना,
हर पल मे बस तुमसे मिलने की अर्दास करना
अपने दुआओं मे खुद से पहले तेरा नाम लेना
तेरे हर खुशी के लिये अपने सासो को भी गिरवी रख आना
क्य समझ पाओगे तुम मेरे की गह्राईयो अपनी छवि को

की तेरा खुद से जाते ही सासो का थम जाना
तेरे एक उदासी पे मेरे अस्तित्त्व का भिखर जाना
की तेरे मुस्कान से मेरे अंधरे मे उस उजाले का होना
कया समाज पाओगे तुम कया हो मेरे लिये
जैसे प्यासे को को पानी ही अमृत
भूखे  को भोजन की वो स्वर्ण थाली

कया समाज पाओगे तुम मेरे बाते
जो कहा नही कभी इस ज़ुबाँं मे कभी
ये मन जो तुम्हे खो देने के ड़र कही बढता नहीं
इस दिल मे जो है वो ज़ुबाँ पे कभी लाता नही
कया कहना इतना जरूरी है,
इस फिक्र और परवाह मे कया मेरा हाल तुम्हे बयाँ होता नहीँ
कया कभी समझ पाओगे तुम मुझे
कया कभी समाज पाओगे तुम मुझे……

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