वो एक शाम यारो के नाम

एक अन्जाना सफर हुआ शुरु कुछ यारो के संग
चल परे हम साथ जहा ना कोई अपना था, ना कोई साथ हमारे
केवल हम यार और वो छत का शांम हमारे साथ
घंटो बैठ उन कब बित गया वो समय, हमे पता ना चलता
फिर कोई हम मे से समय देख हमे समय की याद दिलाता।

बीते वो दिन ना जाने कितने लराईयो और मस्ती मे,
फिर एक मोर पे आया एक यार हमारे संग
चल परे उस राह मे हम एक अलग ही ढंग मे
हाथो की पाच उंगलियाँ हो जैसे संग मे
एक की बात ही निराली थी
मानो सारे यन्त्रो का ज्ञान गटक ली हो सारी,
दूज था हम मे सबसे तिंगू,
परंतु कारनामे मे था हम सबसे वो लंबू।
साथ मे थे हमारे एक ब्रम्हचारि,
किन्तु उनकी हरकते से बने वो अलग ही ज्ञान के पुजारी।
संग मे जुरे हमारे एक बलवान,
पर अकल से निकले वो बाल्कन्द शैतान।

कुछ मोर तो ऐसा आया,
मानो छिटक के निकल गये उंगलियाँ के साये
दूर दूर से हो गये एक दूजे से सारे,
पर दूरियों मे भी वो मन की डोर थी साथ हमारे।
कभी लरे कभी झगरे कभी साथ मिलकर हसे तो कभी रोयें
हाथ के बल के साथ सबके मन का प्रेम भी देखा,
वो शाम अलग ही थी उन यारो के नाम,
जब बैठे पाँच निकाल देते संग शाम और वो रात।
लिखने को इतने है की, पन्ने कम पर जाये
वो कुछ पल की यादो की डोर को पिरोने मे,
हमारे पस रखे धागो की डोर कम पर जाये।
संग बिते वो कुछ पल ऐसे मानो
काल की बात हो और आज दोहरा रहे हम संग हो।

वो एक शाम यारो के नाम थे….

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