“हर मंज़िल आसान नहीं होती…”

एक कदम बढ़ा चला हु उस मंज़िल ओरे मै
रस्ते नहीं है आसान पर बढ़ चला हु उस मै उस ओरे
गिरूंगा कई बार उस राह में पर रुकना नहीं मुझे
मुस्किले भी आयंगे बहुत झुकना नहीं है मुझे
एक मंज़िल तो सबके होते जीवन में होती है
पर हर मंज़िल आसान नहीं होती सबके जीवन में

ठोकर तो लगनी है इस राह में कई हमें
रुकना नहीं बस इरादा कर चल परता हु
आयंगे कई कितने ही मुस्किले इस डगर पे
मुँह तोर जवाब देकर चल परता मैं
जीत तो कई लेते है अपने मंज़िल की डगर को को
मज़्ज़ा तो मुश्किल डगर को पर करने में है
क्युकी हर मंज़िल आसान नहीं होती

जिस तरह सूखे तालाब का कोई वजूद नहीं होता
बिना मकसद की ज़िन्दगी का भी कोई वजूद नहीं होता
जीता तो हर कोई है इस जीवन को
कोई दुनिया के पीछे भाग कर
तो कोई दुनिया को अपने पीछे भगा कर
एक हे ज़िन्दगी मिली है हमे, खली न जाने देंगे इसे
मंज़िल भले ही दूर कितना भी हो हमसे
डर के पीछे हम न कभी हटने से रहे

आसानी से हर चीज़ मिल जाए तो मज़्ज़ा ही क्या है
असली खुशी तो डर को हरा के जितने में है
मंज़िल कितना भी दूर और मुश्किल भले ही हो
हम तो पाकर ही रहेंगे उसे एक दिन इस जिंदगी में
तब कही किसी मोरे पे आकर हम भी कहेंगे सबसे
हर मज़िल आसान नहीं होती
हर मज़िल आसान नहीं होती। ……..

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