मै तलाशता हूँ खुद को, इस अंधेरे में कहीं।
कभी इन अनजान रास्तों में, तो कभी खुद में ही कहीं।
मैं तलाशता हूँ खुद को, जो कभी होता था मैं कभी,
वो कल जो आज में गुम सा हो गया है कहीं।
वो कल जिसमें ना कोई गम था, ना ही कोई चिंता।
हर रातों की नींद में अलग ही जाम सा था,
और हर सुबह कुछ अलग ही ताज़गी।
ना किसी को पाने की दुआ अदा करते थे,
ना ही किसी से दूर जाने का डर था।
क्यूँ इस लोगों से भरी भीड़ में भी अकेलापन सा लगता है,
क्यूँ इस मन के किसी कोने की खालीपन सा लगता है।
क्यूँ आज कल सा नहीं है,
और चलो मान लिया हमने ये कल सा नहीं है,
फिर ये आज ऐसा ही क्यूँ है।
क्यूँ तलाशते हैं हम उस अनजान रास्ते को,
क्या खो गया है इधर, क्या पाना है हमें।
बस एक सफर में सफर पर निकल पड़े हैं,
खुद को तलाशने के लिए।
उस कल को छोड़, एक नए आगाज के लिए।
पर ये तलाश अब वह नहीं जो पीछे छोड़ आये हम,
एक नई मंजिल, एक नए सफर पर चले आये हम।
हाँ, मैं तलाशता हूँ खुद को, मै तलाशता हूँ खुद को।
” मै तलाशता हूँ खुद को “